अध्याय 101

समर का दृष्टिकोण

"तुम कितने बड़े डरपोक हो," मैंने फिर कहा, लेकिन अब मेरी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बस बेबसी भरी-सी कोमलता थी। "जब कोई देख नहीं रहा होता, तभी तुम खुद को ऐसा क्यों होने देते हो? जब हम अकेले होते हैं, तभी तुम खुद को मुझे चाहने की इजाज़त क्यों देते हो?"

उसकी जबड़े की मांसपेशियाँ तन गईं...

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